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Monday, February 15, 2016

साहिर लुधियानवी : मेरे गीत तुम्हारे Sahir Ludhianvi : Mere Geet Tumhare

मुझे यह बताते हुए बहुत खुशी हो रही है कि साहिर लुधियानवी पर मेरी दूसरी पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है - साहिर लुधियानवी : मेरे गीत तुम्हारे | यह पुस्तक साहिर के गीतों पर मेरे तीन वर्षों के अध्ययन का परिणाम है | इसे स्टार पब्लिकेशन्स, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित किया गया है |

साहिर फिल्मी-गीतों को महज मनोरंजन का साधन नहीं मानते थे | उन्होंने अपने गीतों में कई विषयों को उठाया | उन्होंने न सिर्फ सामाजिक बुराइयों पर घात किया, बल्कि आजाद भारत के हालात, उसके भविष्य की रूपरेखा, धार्मिक सौहार्द, स्त्रियों की स्थिति, वक्त की ताकत, प्रेम की अवधारणा जैसे कई जटिल विषयों पर अपने विचार रखे । साहिर के अलावा शायद ही किसी गीतकार का कैनवास इतना विशाल रहा हो । मौजूदा पुस्तक में इन विषयों पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है और साहिर के विचारों को जानने, समझने की कोशिश की गई है |

साहिर ने 115-120 फिल्मों के लिए लगभग सवा से साढ़े सात सौ गीत लिखे । मुझे उनकी 114 फिल्मों के 712 गीतों की जानकारी मिली | इनमें से मुझे 696 गीत उपलब्ध भी हो पाये । प्रस्तुत पुस्तक इन्हीं 696 गीतों का सार है |

Saturday, January 9, 2016

कार्यकर्ता का पहचान-चिह्न

जब एक हीरो की फिल्म पिटती है, तो वो पिटता है, परंतु जब बड़े नेता की रैली पिटती है, तो उस प्रदेश का पार्टी-अध्यक्ष पिटता है | यह ठीक वैसा ही है कि शाहरुख खान की पिक्चर देखने लोग न आयें और गलती सिनेमा हाल के मालिक की मानी जाए | पर साहब! अगर आप राजनीति में रुचि रखते हैं तो मानेंगे कि यहां तो ऐसे ही चलता है | गलती केन्द्रीय नेता की नहीं मानी जाती | कोई नहीं कहता कि दिल्ली के नेता को जनता सुनना नहीं चाहती, या सुनने लायक नहीं समझती | कोई कह भी नहीं     सकता | जो कहेगा, अपने पद से हाथ धोएगा; और पद सबको प्यारा होता है | यह नौकरी करने वालों का देश है | यहां अफसर, बाबू, नेता, यहां तक कि उद्धोगपति भी अपनी कुर्सी बचाने के चक्कर में रहते हैं | यहां विरोध करने, न-करने का फैसला सामने वाले का कद देखकर तय किया जाता है |

ऐसे में यह स्वाभाविक था कि जब हमारे पड़ोस वाले जिले में दिल्ली के नए नेताजी की रैली पिटी, तो हमारे प्रदेश अध्यक्ष रामरतनजी की बड़ी खिंचाई हुई | उनकी स्वामिभक्ति पर प्रश्नचिह्न लगाए गए और उनकी सफाई भी नहीं सुनी गई | ऊपर से उन्हें हफ्ते भर बाद ही दिल्ली बुला लिया गया और  बताया गया कि नेताजी आपको एक मौका और देना चाहते हैं, इसलिए अगले महीने आपके यहां एक और रैली रखवाई जा रही है | यह सुनकर उनकी हालत काटो तो खून नहीं वाली हो गई, पर बेचारे कुछ कह नहीं पाये | जी हां! सब इंतजाम हो जाएगा’, आप चिंता न करें, इस बार आप निराश नहीं होंगे’, जैसी फीकी बातें कहकर खिसियाते हुये आ गए |

अब तो मैं गया काम से ! रामरतनजी जानते थे कि इतने कम समय में दूसरी रैली उनके यहां जान-बूझकर रखवाई जा रही है | अभी कौन से चुनाव होने वाले हैं, जो ये रैलियां कर रहे हैं |’ पर कहे   कौन ? वो देख रहे थे, दिल्ली में बैठे उनके विरोधी उनकी जड़ों में मट्ठा दाल रहे हैं, अपना बदला चुका रहे हैं, पर वो कर क्या सकते थे ? गले का सांप, चाहे फुफकारे या काटे, उतारा नहीं जा सकता था | रैली में तो भीड़ जुटवानी पड़ेगी, चाहे कुछ भी हो |

यह रैली हमारे जिले में होनी थी, और हमारे यहां पार्टी की हालत खराब थी | रामरतनजी दिल्ली से सीधा हमारे यहां आ गए | तुरत-फुरत में सभी विश्वासपात्रों की मीटिंग बुलाई गई, पर ठोस नतीजा सिर्फ इतना निकल कि रैली के लिए मैदान, मंच, कुर्सी, पुलिस आदि की व्यवस्था का काम बंट गया | जो असली समस्या थी, यानि भीड़ जुटाने की थी, उस पर बातचीत अगले दिन के लिए टाल दी गई |

रात भर में ही पार्टी के सभी कार्यकर्ताओं में खबर फैल गई कि दिल्ली के नए नेता की रैली के लिए भीड़ जुटाने के लिए मीटिंग हो रही है | खबर यह भी फैली कि रामरतनजी की बहुत परेशान हैं और वो कुछ भी करके रैली सफल करवाना चाहते हैं | इस खबर के फैलते ही छः महीने से सोई पार्टी जाग गई,  सोई उम्मीदें जाग गईं |

छः महीने पहले ही वो मनहूस घड़ी आई थी, जब रामरतनजी ने दिल्ली के इन्हीं नए नेताजी के निर्देश हमारे जिले में लागू किए थे | नतीजा यह निकला कि हरिभाई जैसा ठेठ अव्यवहारिक व्यक्ति ईमानदार माने जाने के कारण जिला अध्यक्ष बनाया गया और जिला इकाई का साइज़ घटाकर एक-दहाई कर   दिया गया | दिल्ली के नए नेताजी का मानना था कि पार्टी के अंदर अनाप-शनाप लोगों की भीड़ जमा हो रखी है, जिनका एकमात्र काम घूसखोर अफसरों को ब्लैकमेल करना है | हर ऐरे-गैरे, नत्थू-खैरे को पार्टी-पद देकर पदों की गरिमा खत्म कर दी गई है | मोटे-तोंदिल नेताओं की पार्टी का साइज़ भी तोंदिल हो गया है | उनका पहला वार हमारे प्रदेश पर ही हुआ | हमारे जिले में चार-छः पुराने लोगों को छोड़कर लगभग सभी पदाधिकारियों की छुट्टी कर दी गई | यही हाल बाकी जिलों में भी हुआ | चारों तरफ हाहाकार मच गया, परंतु कोई कुछ नहीं बोला क्योंकि समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में नए नेता के इस काम की भूरि-भूरि प्रशंसा हो रही थी | प्रॉपर्टी डीलरों और दलालों से पार्टी को मुक्ति कराने की मुहिम शुरू’, पार्टी को स्लिम-ट्रिम बनाने की कवायद रंग लाई जैसी हैड्लाइन्स जब छप रहीं हों, तो चुप्पी लगाना ही बुद्धिमानी रहती है | एक राजनीतिक दल के नेताओं और कार्यकर्ताओं में यह खासियत होती है कि वो जरूरत पड़ने पर अपना बड़े-से-बड़ा घाव छुपा लेते हैं, दर्द पी लेते हैं | राजनीति में टिके रहने और तरक्की करने के लिए यह जरूरी गुण है | यहां समय देखकर ज्यादा को कम या कम को ज्यादा बताना  कला माना जाता है | मूर्ख लोग इसे अवसरवादिता और सयाने इसे समय देखकर चलना कहते हैं | हमारे जिले में सभी सयाने थे, सो वो उस वक्त कुछ नहीं बोले | बस उचित समय का इंतज़ार करने  लगे |

छः महीने बाद उचित समय अब आया था | नए नेता की रैली और रामरतनजी की परेशानी एक शुभ संकेत थी | अगले ही दिन रामरतनजी के होटल के बाहर गाड़ियों की भीड़ लग गई | सभी नेता-कार्यकर्ता अपने नए-पुराने कुरतों पर कलफ लगाकर पहुँच गए | नेता लोग रामरतनजी ओर लपके तो कार्यकर्ता होटल के रैस्टौरेंट की ओर | राजनीति में फ्री का माल उड़ाना भी एक किस्म का सुख है, जिससे कोई भी कार्यकर्ता अपने-आप को वंचित नहीं कर पाता है | उधर मिलने वालों ने रामरतनजी का मिलने के नाम पर घेराव कर लिया | कुशल-क्षेम के दौर-पर-दौर चलने लगे और आप तो हमसे नाराज हो गए’, आपने तो हमें पूछना बंद कर दिया जैसे ताने सुना-सुनाकर उन्हें बैचेन कर दिया गया | कई घंटों तक यह सिलसिला चला और शिष्टाचार के हर संभव सलीके से उन्हें जता दिया गया कि आप तो गए काम से.........! 

रैली का क्या हाल होगा, यह रामरतनजी को स्पष्ट हो गया | मामला इतना आसान नहीं है, कुछ तो करना पड़ेगा.....”  लंच टाइम तक तय हो गया कि कल एक बड़ी मीटिंग बुलाई जाएगी, जिसमें पार्टी के सभी नए-पुराने, छोटे-बड़े नेताओं व कार्यकर्ताओं को बुलाया जाएगा | रामरतनजी खुद यह मीटिंग लेंगे और इसमें हर नेता-कार्यकर्ता को खुलकर बोलने की आजादी होगी | पत्रकारों व लोकल टीवी वालों को इससे दूर रखा जाएगा | घर की बातें बाहर वालों को क्यों बताएं ?

अगले दिन होटल के विवाह-हाल में पार्टी की मैराथन मीटिंग हुई और रामरतनजी को समझ आ गया कि असली गड़बड़ कहां हुई | उन्हें बार-बार याद दिलाया गया कि पहले हमारे यहां एक जिला-अध्यक्ष के अलावा चार उपाध्यक्ष, चार महासचिव, बीस सयुंक्त सचिव और सोलह संगठन मंत्री थे, जो अब घटकर एक-एक रह गए हैं | बाकी चालीस खुद को बेरोजगार महसूस करते हैं, अनाथ महसूस करते हैं |

“आप यह बताइये, किसी को पद देने में पार्टी का क्या घिस जाएगा? अगर चार की बजाय चौदह या चालीस संगठन मंत्री भी हो गए, तो क्या हर्ज़ है?” 

“हमने यह तो नहीं कहा कि पद के साथ हमें ज़िम्मेदारी भी दो | हमें पद पार्टी के अंदर अपनी भूमिका बढ़ाने के लिए नहीं चाहिए | वो हमें इसलिए चाहिए ताकि पब्लिक में अपने बारे में एक इम्प्रैशन बना सकें, लोगों को झूठ बोल सकें कि हम पार्टी के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं  |”

“जब एक कार्यकर्ता के पास पद होता है तो उसके लिए पब्लिक में काम करना आसान होता है | वो  विजिटिंग कार्ड दिखाकर किसी भी दफ्तर में बेधड़क घुस सकता है, अपनी गाड़ी पर अपना पदनाम लिखकर पुलिस वाले से चालान बचा सकता है, टोल और पार्किंग के दस रुपए बचा सकता है, लेटर पैड पर किसी की सिफारिशी चिट्ठी लिखकर अपना दिनभर का खर्चा निकाल सकता है | और ये सारे काम वो पूरी अकड़ और धौंस के साथ कर सकता है |”

“आप बड़े नेता नहीं समझते हो, पार्टी-पद हमारे लिए संजीवनी बूटी है | यह हमारी रोजी-रोटी है | और जरा सोचिए ! उसके बदले में हम पार्टी के लिए कितना कुछ करते हैं | आप बड़े लोग टिकट लेकर विधायक, सांसद बनते हो, मंत्री बनते हो, पर हमें क्या मिलता है - पार्टी का एक सूखा सा पद, और वो भी अहसान के तौर पर....... मत भूलिए हर कार्यकर्ता अपने क्षेत्र का छोटा-मोटा नेता होता है, उसके आगे-पीछे दो-चार समर्थकों की टीम होती है | वो बेचारे भी इतराते फिरते हैं कि हमारे भैयाजी फलां-फलां हैं | अब अगर पार्टी उसे यह सूखा सम्मान भी नहीं देगी, तो वो कैसे काम  करेगा ?”

“हम कौन सा विधायक का टिकट मांग रहे हैं ? अरे ! हम तो वार्ड-मेम्बर के लिए भी नहीं कह रहे हैं | क्या हमें अपनी औकात नहीं मालूम ? चुनाव लड़ने लायक पैसा है किसके पास ?”

एक ने अपना दुखड़ा सुनाया, “मेरे मुहल्ले के दरोगा ने मुझे सुना दिया - पहले तो आप पार्टी के उपाध्यक्ष थे, अब निकाल क्यों दिया ? उस दिन के बाद उसने मुझे पूछना बंद कर दिया | मेरी तो अपने इलाके में पहचान खत्म गई | आप बताइए, मेरे कहने से कौन आयेगा रैली में ?”

“आप दिल्ली वालों को बता दीजिये, दो-चार रैलियां फ्लॉप होने तक तो वो आपको डांट सकते हैं, पर उसके बाद बदनामी उन्हीं की होगी | अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को उपेक्षित करके कोई नेता चल नहीं सकता |”

लुब्बो-लुबाब यह कि सबने तबीयत से अपनी भड़ास निकाली और जमकर खिंचाई की | रामरतनजी को अच्छे से समझा दिया गया कि अगर रैली सफल करवानी है तो उन्हें क्या करना होगा | शाम को ही रामरतनजी ने दिल्ली के नए नेताजी के विशेष सलाहकार से बातचीत की | तय हुआ कि अभी जो करना है, रामरतनजी अपने स्तर पर कर लें | नेताजी को रैली तक विशेष सलाहकार संभाल लेंगे, पर अगर फिर भी भीड़ नहीं जुट पाई तो रामरतनजी मामले को खुद निपटाएंगे | उन्होंने रिस्क लेना कबूल किया | उनके पास कोई चारा नहीं था | रैली के फ्लॉप होने की गारंटी थी | रिस्क लेने से शायद कुछ बात बन जाए | 

हफ्ते भर के अंदर ही पार्टी की जिला इकाई में विस्तार किया गया | रेवड़ियों की तरह पद बांटे गए | पंद्रह उपाध्यक्ष, आठ महासचिव, तीस सयुंक्त सचिव और बीस संगठन मंत्री बनाये गए | तीन बूढ़े खाँटी नेता, जिनको ठिकाने लगाना था पर लगाया नहीं जा सका था, उनको मिलाकर एक मार्गदर्शक मण्डल बनाया गया | कुछ पद खाली रखे गए ताकि समय पड़ने पर उन्हें भरा जा सका | उम्मीद की गई कि कुछ लोग इन पदों के लालच में भी वफादार बने रह सकते हैं | पार्टी की तरफ से सभी पदाधिकारियों को उनके नाम व पदनाम वाले लेटरपैड व विजिटिंग कार्ड दिये  गए | आठों महासचिवों के इलाकों में उनके चंगु-मंगु समर्थकों के नाम से बधाई देते बड़े-बड़े होर्डिंग लटकाए गए | फ्री के प्रचार से चंगु-मंगु भी खुश हुये | उन्होंने भी इस तरह जताया मानो ये होर्डिंग उन्हीं की ज़ेब के पैसे से लगे हों | सब खुश हो गए | सब की पहचान का संकट खतम हो गया | पार्टी में नई जान आ गई |

तीन हफ्ते बाद नेताजी की रैली हुई और खूब सफल हुई | मैदान के भीतर-बाहर लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा | बसों, ट्रकों, ट्रैक्टरों में लोग भर-भरकर लाये गए | नेताजी प्रसन्न हुये और रामरतनजी ने चैन की सांस ली | और इस प्रकार यह सिद्ध हो गया कि नए नेता की नई नीतियाँ को नकारने और पुराने पापियों के पनपने के पश्चात ही पार्टी की प्रतिष्ठा समाज में पुनः प्रतिष्ठित हो पाती है | अब रामरतनजी बाकी जिलों में भी यही काम करना चाहते हैं, बस विशेष सलाहकार के आदेश की प्रतीक्षा है, जो इन दिनों नए नेता का मन बदलने के प्रयास में लगे हैं |

(शुक्रवार, 1 -15  दिसंबर,2015 )


 

Tuesday, September 29, 2015

लोकभाषा के हितैषी


एक थे राजा मंथरमति। एक बार उन्हें एक रिपोर्ट के बारे में जानकारी मिली, जिसमें लिखा था कि भारत की अनेक लोकभाषाएं विलुप्त होने की कगार पर हैं। चूंकि भाषा एक क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान होती है, इसलिए भाषा के साथ-साथ उसकी सांस्कृतिक पहचान पर भी खतरा रहता है। इससे राजा साहब चिंता में पड़ गए। उन्हें लोकभाषा का यह संकट अपनी पहचान का संकट दिखा। अब तक उन्हें लगता था कि अंग्रेज बहादुर की बुलाई मीटिंग में उनका खास किस्म की अचकन और पगड़ी पहनना ही उनके राज्य की सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने के लिए काफी है। पर रिपोर्ट को जानने के बाद (पढ़ने के बाद नहीं) उन्हें लगा कि संस्कृति की रक्षा के लिए लोकभाषा को बचाना जरूरी है। सो उन्होंने इस दिशा में प्रयास शुरू किए।   
सबसे पहले उन्होंने विचार किया कि उनके राज्य की अपनी एक राजभाषा होनी चाहिए। इस बारे में उन्होंने अपने मंत्री वक्रबुद्धि से चर्चा की, जिन्होंने उनसे असहमत होने के बावजूद भी हमेशा की तरह सहमति जताई। तय हुआ कि इस बारे में मंत्रणा करने के लिये लोकभाषा के विद्वानों को बुलाया जाए। जनता की भाषा अपनाने के लिए जनता के विचार जानने जरूरी हैं। 
नियत दिवस पर सात विद्वान दरबार में उपस्थित हुये। राजा साहब ने गौर किया कि उनमें से तीन विद्वानों की भेषभूषा बाकी चार से अलग है और वो उन चारों से दूरी बनाकर बैठे  हैं। उनके चेहरे पर साफ लिखा था, ‘ये यहां क्या करने आ गये !’ राजा मंथरमति ने इशारों में वक्रबुद्धि से पूछा, ‘ये माजरा क्या है?” वक्रबुद्धि ने भी इशारों में अनभिज्ञता जताई। राजा साहब ने इशारों में उनसे बात करने को कहा और वो अपने आसन से खड़े हुये। सामान्य शिष्टाचार के सवाल-जवाब के बाद उन्होंने पूछा,“ हे विद्वानों, हमारे मन में आपकी भेषभूषा की विभिन्नता को देखकर जिज्ञासा उठ रही है, कृपया कर उसका निराकरण कीजिये।” 
“हे मंत्रिश्रेष्ठ, हम आपके राज्य के ‘अ’ क्षेत्र से आये है। चूंकि यह भेषभूषा हमारी सांस्कृतिक पहचान हैं,  इसलिये  यह ‘ब’ क्षेत्र की भेषभूषा से भिन्न है।”  
“और हम चारों ‘ब’ क्षेत्र से आये है, जहां ‘ब’ भाषा बोली जाती है, और यह ‘अ’ भाषा से भिन्न है।” 
“तो आप यह कहना चाहते हैं कि आपकी भाषा, भेषभूषा और संस्कृति एक-दूसरे से अलग है ?” 
“जी हां, बहुत अलग।” 
मंत्री से राजा को देखा, राजा ने मंत्री को। वो भी हैरान से थे। ‘हमारा पूरा राज्य तो कुल तीस किलोमीटर पर खत्म हो जाता है, उसमें भी दो संस्कृतियां, दो भाषायें!’ 
“पर हमें तो आज तक मालूम ही नहीं था कि हमारे राज्य में दो किस्म की संस्कृतियां बसती हैं। हमें तो दोनों एक समान लगती हैं।” 
“नहीं महाराज ऐसा नहीं हैं। दोनों एक दूसरे से काफी अलग हैं। अब आप हमारे लोकनृत्यों को ही ले लीजिये। ‘ब’ क्षेत्र में नृत्य करते हुये तीन कदम आगे और दो कदम पीछे रखे जाते हैं, जबकि हमारे यहां चार कदम आगे और तीन कदम पीछे।” 
“अरे, पर बात तो वही हुई न ! कुल मिलाकर दोनों एक कदम ही तो आगे बढ़े।” 
“अंतर सिर्फ यही नहीं है महाराज। बाहर से देखने पर दोनों संस्कृतियां चाहे एक सी दिखें, पर भीतर से देखने पर आपको ये अलग दिखेंगीं। जैसे हमारे यहां त्योहारों में पकौड़े पीली सरसों में बनाये जाते हैं, तो उनके यहां काली सरसों में। अब चाहे बाहर वाले को दोनों सरसों दिखें, पर हम तो जानते हैं कि काली सरसों पीली सरसों से अलग है।” 
इसके बाद विद्वानो ने उन्हें विस्तार में बताया कि किस प्रकार संस्कृति की तरह उनकी भाषायें भी अलग है। उनके तर्क सुनकर राजा मंथरमति परेशान हो गये। ये तो दिक्कत हो गयी। अब राजभाषा का क्या होगा ? जब ‘अ’ और ‘ब’ भाषा के आंतरिक मतभेदों की बातें उनके सिर के ऊपर से गुजरने लगीं, वो उन्होंने तय किया कि मामले को वक्रबुद्धि के भरोसे छोड़कर थोड़ा आराम किया जाये। वो काफी मानसिक श्रम कर चुके थे, अब आराम जरूरी था। वक्रबुद्धि मानो इसी पल की प्रतीक्षा में थे। वो जानते थे कि ज्यादा दिमागी मेहनत राजा साहब के बस की नहीं हैं। वो जल्दी थक जाते हैं। थकने वाली यह स्थिति हमेशा वक्रबुद्धि के अनुकूल रही। ऐसे में वो जो भी फैसला करते, राजा साहब को मंजूर होता। और मंजूर न होता तो वक्रबुद्धि उन्हें तब तक थकाते, जब तक वो मंजूर न कर लें। वक्रबुद्धि एक ठेठ नौकरशाह थे। वो राजा और प्रजा दोनों को थकाकर अपना काम निकलवाने में माहिर थे। 
राजा साहब के जाने के बाद जब विद्वानों ने वक्रबुद्धि को समझाना शुरू किया, तो उन्होंने एक के बाद एक कई बेतुके सवाल किये। आखिर थकाना जो था। थोड़ी देर में ही वो लोग खीजने लगे, “मंत्री महोदय, अगर आप मामले की बारीकी को पकड़ नहीं पा रहे हैं, तो ये हमारी गलती नहीं हैं। आप एक बात अच्छे से समझ लीजिये - जब रोज-रोज एक दूसरे के साथ रहना हो, तो छोटे दिखने वाले अंतर भी बड़ी खाई पैदा करते हैं। इसलिये चाहे बाहर से दोनों भाषायें एक लगें, पर वो एक दूसरे से भिन्न हैं और रहेंगी।” 
मंत्री वक्रबुद्धि को समझ आ गया कि भाषा और संस्कृति का सवाल इसके जज्बाती जानकारों द्वारा नहीं, बल्कि उन जैसे सयाने नौकरशाहों द्वारा ही हल हो सकता है। 
उन्होंने फिर वही सवाल किया, “बाकी तो सब ठीक है, पर ये बताइये, राजभाषा किसे बनाया जाये- ‘अ’ को या ‘ब’ को ?”  उनका इतना कहना था कि सब लोग बिलबिला उठे। मौका भाँपकर मंत्री जी ने सभा समाप्त की और उन्हें अगले दिन आने का कहा। 
शाम को राजा साहब को मिर्च-मसाला लगाकर किस्सा सुनाया गया और समझाया गया कि वो इन दोनों से जो भी भाषा चुनेंगे, उसे दूसरे इलाके के लोग खुद पर थोपा हुआ मानेंगे। 
“क्या एक इलाके के लोगों को खुश करने के लिए बाकी को नाराज करना उचित रहेगा ?” 
“अब क्या करें?” राजा साहब ने पूछा। और हमेशा की तरह हल वक्रबुद्धि ने निकाला। उन्होंने राजा साहब को समझाया कि भाषा थोपने के मामले में जल्दबाजी करना उचित नहीं है। इससे एक क्षेत्र के लोग खुद को दूसरे से श्रेष्ठ मानने लगेंगे, जो राज्य की एकता के लिये घातक होगा। दूसरा यह कि इनमें से जिस भाषा को भी राजभाषा बनाया जाएगा, वो राजा साहब को भी सीखनी पड़ेगी। इससे अच्छा तो यह रहेगा कि वो उस समय का सदुपयोग अपनी अंग्रेजी मजबूत करने में लगायें। जब वो एक्सेंट मारकर अंग्रेज़ बहादुर से बात करेंगे तो इम्प्रैशन अच्छा पड़ेगा। लगे हाथ दरबार के उच्च पदाधिकारी भी अपनी अंग्रेजी ठीक कर लेंगे, ताकि अंग्रेज़ बहादुर के साथ पत्राचार बढ़िया अंग्रेजी में हो सके। इससे राज्य के सम्मान में भी वृद्धि होगी।” 
“तो क्या अब हम अंग्रेज़ी को राजभाषा बनायेंगे ?” 
“नहीं महाराज, हमारे दरबार के निचले कर्मचारी अंग्रेज़ी नहीं जानते हैं; सिखाने की जरूरत भी नहीं  है। वो अपना काम हिन्दी में काम करेंगे और हम अंग्रेजी में।” 
राजा साहब को प्रस्ताव पसंद आ गया। तय हुआ कि राज्य की भाषा हिन्दी व अंग्रेजी होगी। 
“परंतु लोकभाषा का भी तो कुछ किया जाना चाहिये। आखिरकार हमारी संस्कृति का सवाल है।” राजा मंथरमति का मन अब भी रिपोर्ट पर अटका हुआ था। 
“उसका भी हल है महाराज। हिन्दी-अंग्रेजी की यह व्यवस्था अस्थाई होगी और सिर्फ तब तक कायम रहेगी, जब तक विद्वान लोग यह तय नहीं कर लेते कि किसे राजभाषा बनाया जाये। जैसे ही सर्वसम्मत हल निकल आयेगा, यह व्यवस्था बंद कर दी जायेगी।” वक्रबुद्धि जानते थे - न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी। कोई भी इंसान अपनी भाषा, अपनी संस्कृति को दूसरे से कमतर नहीं मान सकता; वो भी तब जब इतना कुछ दांव पर लगा हो। 
अगले दिन वक्रबुद्धि ने सातों विद्वानों को बुलवाया और बताया कि राजा साहब आपकी विद्वता से प्रसन्न हैं और उन्होंने  एक बड़ी ज़िम्मेदारी आपके ऊपर सौंपी है। आपको अपनी-अपनी भाषाओं का एक शब्दकोश बनाना होगा। इसमें हर शब्द का अर्थ हिन्दी व अंग्रेजी में दिया जायेगा। यह पांच साल का प्रोजेक्ट है, जिसकी समय-सीमा जरूरत पड़ने पर बढ़ाई भी जा सकती  है। प्रस्ताव सुनकर सभी विद्वान फूले न समाये। राजा साहब ने अद्भुत हल निकाला है। अब हम बतायेंगे कि कैसे हमारी भाषा बाकी से अलग और बेहतर है। उनके खुश होने से वक्रबुद्धि भी खुश हुये। वो मानते थे कि पढे-लिखे लोगों को अगर साध कर नहीं रखा जायेगा तो वो कुछ न कुछ उल्टा-पुलटा करेंगे। ऐसा करके उन्होंने एक तीर से दो निशाने साधे। जरूरत पड़ने पर इन लोगों को ‘कौन बड़ा-कौन छोटा’ के झगड़े में भी उलझाया जा सकता है, जिससे उनका मंत्रिपद ज्यादा निश्चिंतता से गुजरेगा। 
इन दिनों वक्रबुद्धि राजा साहब द्वारा लोकभाषाओं के उत्थान के लिये चलाये जा रहे प्रयासों पर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं। यह रिपोर्ट अंग्रेज़ बहादुर के अलावा मुल्क के प्रमुख समाचारपत्रों, अन्य राजाओं व इस विषय पर कार्यरत यूरोपीय संस्थाओं को भेजी जायेगी, ताकि पूरी दुनिया जान सके कि राजा मंथरमति अपनी लोकभाषाओं के विकास के प्रति कितने समर्पित हैं।
 
 
(आउटलुक हिंदी के 1 -15 सितम्बर 2015 में प्रकाशित )