Thursday, July 3, 2014
Wednesday, April 23, 2014
सिक्युलेरिज्म क्या होता है
मेरी दस
साल की बेटी
ने टी.वी.
देखते हुए मुझसे
पूछा, "पापा ये
सिक्युलेरिज्म क्या होता
है और लोग
ऐसा क्यों कह
रहे हैं कि
सिक्युलेरिज्म खतरे में
है ।"
सवाल मुश्किल था, पर जवाब देना जरूरी था । जब टी.वी. पर रोज़ सिक्युलेरिज्म की बातें हो रही हों, तो बच्चों के इस सवाल को कब तक टाला जा सकता है । मैंने जवाब देने की बजाय उससे पूछा, "तुम्हारे स्कूल में सब बच्चे एक ही तरह का यूनिफार्म पहन कर आते हैं, पर जिस दिन पी. टी.एम. होती है, उस दिन सब अलग-अलग तरह के और रंग-बिरंगे कपड़ों में आते हैं । आपको किस दिन ज्यादा अच्छा लगता है ?"
उसने जवाब
दिया, " पी. टी.एम. के
दिन ।"
मैंने पूछा, "अगर
उस दिन भी
एक ही रंग
और स्टाइल के
कपडे पहने पड़ते
तो?"
"तो मज़ा
नहीं आता ।"
सवाल मुश्किल था, पर जवाब देना जरूरी था । जब टी.वी. पर रोज़ सिक्युलेरिज्म की बातें हो रही हों, तो बच्चों के इस सवाल को कब तक टाला जा सकता है । मैंने जवाब देने की बजाय उससे पूछा, "तुम्हारे स्कूल में सब बच्चे एक ही तरह का यूनिफार्म पहन कर आते हैं, पर जिस दिन पी. टी.एम. होती है, उस दिन सब अलग-अलग तरह के और रंग-बिरंगे कपड़ों में आते हैं । आपको किस दिन ज्यादा अच्छा लगता है ?"
"आपके स्कूल
के बगीचे में
अलग-अलग किस्म
के फूल, पौधे
हैं । अगर
सारे फूल, पौधे
एक जैसे और
एक ही रंग
के होते, तो
आपको कैसा लगता
?"
"बहुत बोरिंग
लगता । मुझे
तो रंग-बिरंगे
लाल, पीले, बैंगनी,
नीले सब तरह
के फूल अच्छे
लगते हैं ।"
मैंने सवाल बदला,
"हम छुट्टी के दिन
दिल्ली में अलग-अलग मॉन्यूमेंट्स
देखने जाते हैं
। अगर ये
सारे मॉन्यूमेंट्स एक
जैसे होते तो...
?"
"फिर घूमने
में कहाँ मज़ा
आता ।"
"अगर सारे
त्यौहार, होली, दीवाली, लोहड़ी,
ईद, क्रिसमस एक
ही तरीके से
मनाये जाते तो...
? अगर सभी में
एक ही तरीके
का प्रसाद होता
तो... ?"
उसने बुरा
सा मुंह बनाया,
"फिर क्या मजा
आता । मुझे
तो होली की
गुजिया भी अच्छी
लगती है और
दीवाली के खील
बतासे भी ।
ईद के दिन
मम्मी के स्कूल
वाली जरीना मैम
की सिवइयां भी
अच्छी लगती है
और पड़ोस वाली
परेरा आंटी क्रिसमस
वाला केक भी
।"
मैंने पूछा, "अगर
सभी त्योहारों में
एक ही भगवान
की पूजा होती
। अगर शिव
जी, रामचन्द्र जी,
दुर्गा माँ, लक्ष्मी
जी, गणेश जी,
सांईराम सभी के
मंदिरों में सिर्फ
एक ही भगवान
होते....अगर पूजा
करने के लिए
मंदिर, गुरुद्वारे, गिरजे या
मस्जिद की बजाए
सिर्फ मंदिर या
मस्जिद या गिरजे
होते, और वो
भी एक ही
डिजाइन और एक
ही साइज़ के,
तो… ?"
और फिर
मैंने अपना आखिरी
सवाल पूछा, "सोचो,
अगर दुनिया में
वैरायटी न होती
- न कपड़ों की,
न रंगों की,
न फूलों की,
इमारतों, पूजा करने
के तरीकों की,
भगवांनों की, तो
क्या ये दुनिया
खूबसूरत होती ?"
"बिल्कुल नहीं" उसने
जोर देकर कहा,
"फिर तो सब
कुछ बहुत बोरिंग
होता ।" (बच्चों
के लिए इस 'बोरिंग' शब्द का अर्थ बहुत
व्यापक होता है)
मैंने कहा, "तो
बेटा, इस वैराइटी
को प्यार करने
का नाम ही
सिक्युलेरिज्म हैं ।
यह सिर्फ धर्मऔर राजनीति का मामला
ही नहीं है
। यह हमारा अपने
आसपास मौजूद विभिन्नता
को स्वीकार करने
और उसे सवांरने
की भावना का
नाम है ।
कुछ लोग चाहते
हैं कि दुनिया
में ये वैराइटी
न रहे, पर
ऐसा हो नहीं
पाता, क्योंकि इस
वैराइटी को चाहने
वाले हम जैसे
लोगों की संख्या
कहीं ज्यादा है
। इसलिये दुनिया
में हमेशा वैराइटी
रहती है और
सिक्युलेरिज्म हमेशा ज़िंदा रहता
है ।"
Wednesday, July 10, 2013
उससे कहना कि
उससे कहना कि
जिंदगी बहुत खूबसूरत है
और,
मैं उसे बेहद चाहता हूँ ।
मैं और जीना चाहता था
गले-गले तलक,
छक जाने की हद तक
तुम्हारे साथ
इसी तरह, बरसों
पर ये उन्हें मंजूर नहीं था ॥
उससे कहना कि
ये बदकिस्मती नहीं थी हमारी
एक साजिश थी
हमारे खिलाफ, उन चंद लोगो की
जिनके हाथ में है
संसद, कचहरी, फौज, फैक्ट्रियां
कि कायम रहे
उनकी जिंदगी की चमक
उनके पाँच तारा होटलों मैं लटकते विशाल फानूस,
गोल्फ के घास,
अरबी घोडों की तरह ।
उनकी खूबसूरतियों
खुशियों की भेंट हुए हैं
हमारे दिन और रात ॥
उससे कहना कि
जिंदगी बहुत खूबसूरत है
और कोई चाहे कुछ भी बकवास
तुम मत मानना ॥
जानना कि
इसमे जो भी बदसूरती है
पैदाइश है उन लोगों की, जिन्होंने
अपने सुख की खातिर
हमारी परेशानी के सामान खड़े किए हैं ॥
कि तुम
इस सच को पहचानना .
जानना कि
ये बदसूरती के धब्बे
जिनके चलते हैं
उनसे ज़ंग लाजिमी है
कि ये
मोजूद है
हमारे इर्द गिर्द
अलग अलग भेष मैं
गडबडी पैदा कर
उसकी गड़बड़ परिभाषा बनाये हुए
कि छिपा रहे उनका सच
हमारी नज़रों से
ये परिभाषायें मुझे मंज़ूर नहीं थी
कि ये
झूठ हैं, इनके गडे हुए,
इन्ही के लिए ।
उससे कहना कि
तुम पैदा करना
इन परिभाषाओं के आर पार देखने की
एक नज़र ।
जानना, कि
शैतान के तर्क के दमख़म से
प्रभावित होने से ज्यादा जरूरी है
उसकी मंसा पहचानना
कि तर्क महज परदे हैं
मोटे-मोटे, रेशमी, चटक, चमकीले
कुछ छिपाने के लिए
उससे कहना कि
इंसानी प्यार और विस्वास
अनमोल पूँजी है हमारी
ये कसौटी है
हर ढांचे को परखने की
कि तुम इन ढांचों को मापना सीखना
जानना, कि
जिंदगी बहुत खूबसूरत है
और इसे यूँ ही बनाये रखना
लाजिमी है
किसी भी कीमत पर ।
उससे कहना कि
पेट की आग सब कुछ नही होती ।
एक आग
दिल में भी जलती है
हर इंसान के
कभी न कभी
उम्र के किसी न किसी दौर में ।
कि तुम पेट की आग बुझाते वक्त
इस आग को न बुझने देना
औरों की तरह ।
जानना कि
दिमाग के उजाले की खातिर
ये आग जलाये रखना लाजिमी है
किसी भी कीमत पर ॥
उससे कहना कि
अस्तित्व के प्रश्नों से जूझने से
ज्यादा जरूरी है
अस्तित्व का भास होना ,
मुस्कुराना और
अपने इर्द-गिर्द मुस्कराहट फैलाना ।
कि जिंदगी को समझने की जिद
बेमानी है
जिंदगी जीने की चाह के आगे,
जिंदगी बांटने की खुशी के आगे ।
कि तुम हँसी बांटना ।
एक चेहरे पर,
दो चेहरों पर,
हज़ार चेहरों पर,
जहाँ तक तुम जाओ,
जहाँ तक जा सको
और रोकना उन्हें जो तुम्हे रोकें ।
उससे कहना कि
इस दुनिया का सबसे बड़ा सच है,
हमारा जिन्दा होना,
इंसान की शक्ल में
कि सबसे बड़ी खुशी है,
एक बच्चे का हँसना,
कि सबसे बड़ी जरूरत है,
जिन्दा रहना,
कि सबसे बड़ी जीत है,
सुखी रहना, जिंदगी भर,
जीत, जो
कभी किसी को
हासिल नही होती,
भ्रम में भी नहीं ॥
कि सबसे बड़ा पाप है,
अपने सुख को चलाने के लिए,
दूसरों के दुखों के बीज बोना,
कि पटवारी की घूस हो
या इराक पर हमला
एक ही समझ के दो रूप हैं
भिन्न -भिन्न आयामों में
भिन्न -भिन्न रूपों मैं ।
कि सबसे बड़ा पुण्य है,
जानते -बूझते
दूसरों के बाग़ बसाना
चाहे, वो फूल
चार दिन ही खिले ॥
उससे कहना कि
जिंदगी बहुत खूबसूरत है,
और
इस खूबसूरती को
बढाना, बांटना लाजिमी है
किसी भी कीमत पर ।
उससे कहना कि
सच टेढे़-मेढे़ रास्तों पर नहीं
पानी की सीधी धार में है ।
साफ़ निर्मल धार में ।
कि तुम रोकना उन्हें,
जो
रपटीली, गन्दी,
पगडंडियों की मिट्टी से मैला करें,
इस धार को ॥
उससे कहना कि,
सच शून्य में नहीं,
हमारे भीतर है,
और
अभिव्यक्ति चाहता है,
हर पल ।
कि तुम उशे बाहर आने देना
दिल की धडकनों से,
पसीने के पोरों से,
आंखों के कोनो से,
फैलने देना चारों ओर, कि
उजाला हो , और
सब पहचाने
सब कहें -
वो है सच,
एक इंसान का सच,
हर इंसान का सच
और फिर चाहे
इस उजाले की खातिर लिखना पडे
तुम्हे भी
एक अन्तिम पत्र,
मेरी तरह ॥
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